Friday, 3 July 2015

                                                  





                                                पतंगें 



गर्मियों के दिन थे, दूकान से गेहूं लाद  कर मुन्ना चक्की  वाले के यहां तुलवा कर पिसवाने धर कर घर को लौट ही रहा था कि रस्ते में अली साहब मिल गए , मैंने आदाब किया तो बोले " जीते रहिये मियाँ ! किधर चल दिए ?"

मैंने कहा : घर जा रहे हैं भाई जान  ! 

अली साहब : अमां  चलिए ! आपको चौक तफ़रीह करा लाएं , अपनी अम्मी को बोल दीजिये कि घंटे दो घंटे में वापस आ जायेगें 

मैंने कहा : ठीक है भाई जान अभी कह कर आता हूँ 

अली साहब : आगे की नुक्कड़ पर मिलिए मैं कुछ सामान ड्योढ़ी से ले लूँ 

करीब दस मिनट बाद वो एक बहुत बड़ा चमड़े का बस्ता नुमा बैग लेकर ड्योढ़ी के फाटक पर नमूदार हुए , बड़ी मुश्किल से वह बैग उठा पा रहे थे, मैंने लपक कर बैग का दूसरा सिरा सम्भाला, वो हांफते हुए शुक्रिया बोले " चलिए इक्का स्टैंड तक की मशक्कत है " 

इक्का स्टैंड पहुँच कर जैसे ही हमने बस्ता नीचे रखा, तभी दो तीन इक्के वाले सामने आये और अली साहब से बोले : आदाब , नवाब साहब ! , हुज़ूर आपका इक्का बिलकुल तैयार है । 

दूसरा बोला " अरे हुज़ूर ! सुबह से आपके ही इंतज़ार में बैठे हैं, घोड़ा तो आपके कदमों की आहट  के बिना पैर उठता ही नहीं 

तीसरा  : अरे हुज़ूर ! हमें भी कदम्बोशी का मौक़ा फरमाएं , पिछली बार आपने हमारे इक्के को तरजीह क्या दी , ये घोडा आपकी ही राह देख रहा है, कसम से उस दिन के बाद कोई सवारी ही नहीं उठा ने दी  इस बदजात  ने 

( दरअसल सभी झूठ बोल रहे थे , उन्हें इमकान था कि अली साहब अपने नवाब खानदान से होने की लंतरानियां  हाँक रहे थे , उनमें जो सबसे जवां था उसने अली साहब का बैग उठा कर अपने इक्के पर लाद  दिया और अपने गमछे से इक्के की गद्दी को झाड़कर बोला : कदम बढाइये  हुज़ूर , इक्का आपकी कदम बोशी को बेताब है "

बड़ी शाइस्तगी ने अली साहब ने अपने पैर उठाकर इक्के पर रखे और मुझसे बोले चढ़े चले आइये मियाँ  । मैं भी उचक कर अली साहब के बगल में बैठ गया , ठुक ,,ठुक. . ठुक कर इक्का अपनी शान से चल पड़ा , रास्ते भर इक्के वाला अली साहब से तरह तरह के सवालात करने लगा , जैसे कि हुज़ूर की मिलकियत किधर किधर है , हुज़ुर कभी लगन वसूलने जाते हैं कि नहीं , वगैरह, वगैरह। . अली साहब भी लम्बी लाबी हांकने लगे , तभी चौक की गलियां दिखने लगीं तो अली साहब ने इक्के वाले से कहा " आप यहीं इंतज़ार   करें, हम अभी काम निपटा  कर आते है,, ज़रा बैग उतारने की जहमत कीजियेगा " और इक्के वाले ने बैग उतार कर इक्का किनारे लगा दिया । 

हम दोनों ने बैग को सिरों से पकड़ा और अली साहब आगे आगे चल पड़े, गली तंग होती चली गई , और मुहाने पर तो लगता था कि बिलकुल बंद हो गई है. मगर एक नाला पार करने के बाद एक दूकान पर अली साहब रुके और जोर से आवाज़ लगाए " अब्दुल मियाँ ! " और एक आदमी चिक उठाकर दूकान से बाहर आया और अली साहब के हाथ से बैग उठाकर दूकान के भीतर ले गया , मैंने देखा दूकान के बाहर बड़ा सा साइन बोर्ड लगा हुआ था जिस पर लिख था " अली पतंग वाले ", शानदार,पतंग, कड़क मंझे, और लचीली शद्दी की दूकान, हर काम तसल्लीबख्श , एक बार ले जाइए बार बार आइये, वग़ीरह....वगैरह , अली साहब बोले सारी जानकारी बोर्ड से लीजियेगा या भीतर भी चलिएगा" 

अली साहब के साथ मैं चिक उठाकर भीतर गया वहा का माहौल दूसरा था, चारों और खस की टट्टियां लगी हुई थीं, गुलाबजल की महक सारे आलम में फैली थी, ऊंची मसनद पर बड़े अली शानदार चिकन का कुर्ता पैजामा पहने हुए तशरीफ़ रखे हुए थे, मैंने उन्हें देख कर आदाब किया वे बोले" जीते रहो बरखुरदार  !! तशरीफ़ रखिये, और मोहम्मद को आवाज़ दी कि बच्चों की नवाज़िश करें , थोड़ी देर में मोहम्मद।  लस्सी, सेवईं, और कुछ फल ले आये , मैं और अली साहब उसे बहुत शालीनता से खा रहे थे  वो बड़ा चमड़े का बैग हम लाये थे उसमें करीब पचास बड़ी पतंगें करीने से रखी हुई थीं , हर पतंग के नीचे एक तह  अख़बार की थी, जिससे किसी पतंग के मुद्दे या काँप से दूसरी पतंग फट न जाए , दूकान के भीतर की और लटाईयां ( चकरियां) लटकी हुई थीं, कोई मांझे से भरी, कोई शद्दी से भरी, कोई बिलकुल खाली, सभी लटाईयां,,नक्काशीदार और शानदार रंगों से सजी हुई थी,, रैक पर नमूने और साइज वार पतंगें धरी हुई थीं, शायद एक या दो बल्ब जल रहे थे मगर सभी चीजें बिलकुल साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थीं , फिर बड़े अली ने हुक्म दिया, " मेरे बच्चो !, अब यहां से सीधे घर का रुख कीजियेगा, बाहर तपिश है, ज्यादा खुले में बीमार पड  जाइयेगा । 

अली साहब बोले : अब्बा हुज़ूर ! हम इका ले कर आये हैं , वो नुक्कड़ पर हमारा इंतज़ार कर रहा है" 

बड़े अली : ठीक है : ये लीजिये , पांच रूपये, दो= दो आपस में बाँट लीजिये और एक रुपिया इक्के वाले को उसजी उजरत दे दीजियेगा , अब देर न कीजिए " 

बाहर निकल कर अली साहब मुझसे बोले मियाँ आप नुक्कड़  की तरफ कदम बढाइये, में एक काम निपटा  कर आटा हूँ", इतना कह कर वो लपक कर एक गली में घुस गए, मगर मैं भी उन्हें इतनी आसानी से छोड़ने वाला न था, उनके पीछे पीछे में भी उस गली में घुस गया , देखा तो एक छोटी सी दूकान की चिलमन उठकर किसी से बात कर रहे थे, " अजी आज बड़ी मुश्किल से मौक़ा मिला है , अब्बाजानी तो  हमारे पीछे अय्यारों की फ़ौज लगा देते हैं , , भीतर से जनानी आवाज़ खखनाई, " जाएये, जाइए,! बहाने खूब होते हैं, आप मर्दों के पास , बताइये ये बंदी क्या कर सकती है आपकी खिदमत में "

अली साहब : अब यूं न खफा होइए , आप हमारी रानी हैं बांदी नहीं , आज रुक्का लाना भूल गया , चलिए बाद में ही सही, ये बताइये ! ये सिलसिला आगे कैसे बढे ?

आवाज़ : अब हम क्या बता सकती हैं , हम औरत हैं जो कुछ करना है आप कीजिए, चाहे हमारे अब्बाजान से बात कीजिए या अपने ! जल्दी पहली फुरसत में कीजिए, नही तो मौक़ा हाथ से जाने का अंदेशा है !

अली साहब : वो क्यों ?

आवाज़ : मगज़ है आपके पास ? पिछली बार ही कह चुकी हूँ कि मेरे निकाह की बातें चल रही हैं घर पर 

अली साहब : आप बिलकुल फिक्र न करे, जब आपने हमें अपना  दिलबर माना है तो ये हमारी जिम्मेदारी है,

तभी घर कर भीतर से जोर की आवाज़ आई " हुश्ना ! किससे बतिया रही हो ?"

हुश्ना : गाहक से अम्मी, फिर फुसफुसा कर बोली, अब निकल लो दिलबर ! खामखाँ दूसरी नौबत  न आन पड़े 

और अली साहब झपटते हुए चिक उठाकर बाहर निकले और यह जा व्ह जा , इस दरम्यान उन्होंने मुझ्र भी नही देखा , मैं  भी उनके पीछे कदम बड़ा कर चल दिया, वो यूं घबराये हुए थे जैसे उनके पीछे कोई भूत पड़ा हो, नुक्कड़  तक हम साथ साथ पहुंचे, वो मुझे  ढूँढ ही रहे थे कि मैं उनके सामने आ गया  । 

मैं : कहाँ रह गए भाई जान बड़ी देर कर दी  ?

अली साहब : कुछ नहीं  कुछ फरोख्त का मामला था, आपकी समझ में न आएगा , चलिए इक्के पर तशरीफ़ रखिये 

रास्ते भर अली साहब बताते रहे कि उनके कितने बाग़ हैं , कितनी मिलकियत मकानातों की है जिससे हर महीने किराया आता है , वगैरह, इसमें वह पतंगों के व्यापार को गोल कर गए , इक्का स्टैंड पहुँच कर अली साहब ने रिक्शे वाले को एक रूपया देकर आठ आने वापस करने को कहा तो इक्के वाला कुछ झक झक करने लगा, बाद में बारह आने में माँन गया, घर की गली की तरफ चलते हुए मैंने उनसे पूछ " ये क्या बात हुई भाई जान आपने तो हद कर दी अपनी असल मिलकियत ये पतंगों का कारोबार नहीं बतलाया इक्के वाले को 

अली साहब : आप समझते नहीं हैं मियाँ, ये गरीब लोग हमेशा कोशिश करते  हैं कि हमसे कुछ न कुछ झटक लें , मगर आप इतने पशो पेश में क्यों हैं मियाँ ?

मैं : मैं नहीं जानता था कि आपका पतंगों का भी व्योपार है, यह तो खुशी की बात है, इससे तो अच्छी  आमदनी हो जाती होगी ?

अली साहब : कुछ लोग इसे नीचे दर्जे का काम समझते हैं, इसलिए अब्बा हुज़ूर  ने ड्योढ़ी के तहखाने में इसका कारखाना  खोला हुआ है , इसके सारे कारीगर गुशल वगैरह कर मुंह अँधेरे आ जाते हैं, भरी दोपहरी में अपने घर जाकर खाना खाकर वापस आ जाते है, शाम को शम्मे जलने वक्त घर चले जाते हैं, इसलिए महल्ले में किसी को पता नहीं चलता 

मैं  : चलिए भाई जान !  आज आपका कारखाना भी देख लेते हैं 

अली साहब : जाहे किश्मत ! आइये तशरीफ़ लाइए 

हम लोग ड्योढ़ी पहुंचे , गेट के बगल से ही नीचे को जाती सीढ़ियां दिख रही थीं, जो इस हिस्से में कल्लू धोबी के गधे बंधे होने की वजह से दिखती नहीं थी ,हम सीढ़ियों से निीचे उतरे दो मोड़ उतार के बाद ही सामने बहुत बड़ा हाल नमूदार हुआ , जिसके एक कोने से दूसरे कोने तक मोटे डंडे लगे हुए थे जिन पर इस पार से उस पार तक धागे लिपटे हुए थे , एक कोने पर  बड़े बड़े कड़ाहों में न जाने क्या उबल रहा था , दूसरे कोने में एक बहुत बड़ी खडी चक्की में न जाने क्या पीसा जा रहा था, हाल  के गलियारे में इस कोने से उस कोने तक पतंगें बन रही थीं 

अचंभित हुआ मैं अली साहब से बोला  : वाह भाईजान ! ये तो बहुत बड़ा कारखाना है , इतने साल हो गए कभी गुमान भी न हुआ 

अली साहब : यही शिफत  तो है अब्बा हुज़ूर  में ! अब देखिये दसियों साल साल से ये कारखना आबाद है , छुनर पंडित जी के आलावा शायद ही किसी को पता हो ,आइये आपको सब कुछ दिखाएँ 

१) ये देखिये ये पतंगों का  कारखाना है, पतंगी कागज़ दिल्ली और  कलकत्ते से मंगवाए जाते है ,इन कागजों के दस्तों को इस बड़े क़टर पर रख कर बड़ी नफासत से काटा  जाता   है ,फिर सिलसिलेवार हर कटे टुकड़े पर चारों और से पतला धागा ऐसी सगाई से चिपकाया जाता है कि सामने से देखने पर पता न चले इससे कागज़ की तंदुरस्ती  बढती है  , फिर इसकी घुटाई होती है और कागज़ पतंग बनने को तैयार है 

२)  ये जो बांस की फंटियां  देख रहे हैं, ये मामूली नहीं हैं, खीरी के जंगलों से बांस मगा कर खपच्चियाँ बनाई जाती हैं, , फिर ये सामने वाली मशीन पर पतंग के काँप बनाये जाते हैं  ( मैंने देखा कि वर्नियर कैलिसपर की तरह का एक मापक इन पतले पतले कांपों  को बार-बार माप कर तराश रहा था ताकि जब तक ये हमवार न  हो जाएँ , एक जहींन कारीगर इन्हें हाथ से छूकर , तसल्ली होजाने तक परख रहा था, फिर एक मर्तबान में इन्हें डाल देता )  कुछ कारीगर पतंगों के मुद्दों केलिए छोटे छोटे टुकड़ों से तीलियाँ तैयार कर रहे थे 

३) अलीसाहब बोले " ये जो बड़े कड़ाह में उबाल रहा है वह सरेस है , ये यूँ ही नही उबाल जा रहा , इसमें कांच के बारीक टुकड़े भी डाले गए हैं, 

४) आगे दिखाते हुए वे बोले ये देखिये ये कांच को बारीक पावडर जैसा पीस रहे हैं , ये कोई आम कांच नहीं हैं , ये बेल्जियम ग्लास के टुकड़े हैं जिन्हें अब्बा इतवार को नक्खास से खरीद कर लाते हैं, कुछ कबाड़ी वालों से भी खरीदा जाता  है 

मैंने कहा : बेल्जियम ग्लास  ? वो कहाँ मिलता है ?

अली साहब बोले : पुराने झाड़ फानूस, नीले या भूरे रंग की  कांच की बोतले, आम काचों से ज्यादा मजबूत होती हैं , इस पावडर को सरेश में मिला दिया जाता है, और वो देखिये उन खम्बों की जानिब, ये सरेस कई मर्तबे इन धागों पर लेप दिया जाता  है , सूखने पर कडकडार मांझा तैयार होता है, जो  " अली का मांझा " नाम से शोहरत पाया हुआ है , अच्छे पतंग बाज इस मांझे की बड़ी कद्र करते हैं 

मैंने फिर पूछा : भाई जान ! इतनी बड़ी पतंगें आखिर कार बनती कैसे हैं  ?

अली साहब बोले : पतंगी कागज तैयार होने, बांस की काँप और मुद्दे तैयार होने के बाद पतंग को इतनी सलाहियत से बनाया जात्ता है कि एक पतंग बनाने में करीब एक घंटा लग जाता है , तब तैयार होती है " अली की बेमिशाल पतंग", जो यहां से चारों और के सभी जिलों में बहुतायत में बिकती हैं , ये वो पतंग है जो एक ठुनकी ( इशारे) पर अपना करतब दिखाती है, । 

मैंने कहा : भाई जान ! शद्दी और लटई भी बिक रही थी दूकान में 

अली साहब : जी हाँ ! वो भी "अली " के नाम से बिकती है, जो बांस की खपच्चियां बच जाती हैं उन्हें घिस  कर हमवार किया जाता है फिर सहारनपुर से मंगाए चक्के और डंडी में खांचे बना कर लटई बन जाती है, इसे वो हाल के नुक्कड़ पर जमील मियाँ अंजाम देते हैं 

मैं : भाई जान ! ये सब तो हुआ, मगर वो चौक में चिलमन के पीछे की कहानी भी सुनाइए  ! 

अली साहब (नकली गुस्से में ) : मियाँ बड़े शरीर हैं आप, पीटे जाएंगे , कभी  ! अमां ये सब बातें क्या यहाँ कहने की हैं, मियाँ दीवारों के भी कान  होते हैं ! 

मैंने कहा : माफ़ कीजियेगा भाईजान , अभी तो सवा दो रुपये  पड़े हैं हुज़ूर की जेब में क़त्ल हो जाने के लिए, चलिए पांडे की दुकान चलते हैं इसे जिबह करने को ! 

मेरा इतना कहते ही अली साहब फूल गए और भूल गए कि उसी रुपयों के भाई, ढाई रूपये मेरी जेब में भी  पड़े हैं , पांडे की दूकान पर दो-दो समोसे और एक-एक चाय कुल खर्च महज एक रूपया, अली साहब को कोई उज्र न था , मेरे उकसाने पर बोले 

अली साहब : मियाँ ! क्या बताएं इस बेदर्द ज़माने को ! वो हुश्ना हमसे मुहब्बत करती है, पर हमारे अब्बा को वह फूटी आँख नही सुहाती है, वो कहते हैं कि मनिहारन की लड़की से निकाह पढ़ कर नवाबी खानदान  की इज्जत ख़ाक में मिलाओगे ? , बस  एक बार उसने  हमें दूकान पर देखा  तो अपनी मुहब्बत का इज़हार करने के लिए एक गुलाब में पैबस्त रुक्का हमें फैंक गई, कई दिन तक तो हमारी हिम्मत ही नहीं हुई पर  बाद में इत्र में भीगे  गुलाब में  पैवस्त अपना रुक्का उसकी दूकान पर उसके हाथों में दे आये, तब से सिलसिला  चल पड़ा है " 

मुझे मालूम था कि यह उनकी कपोल कल्पना थी , दरअसल वो खुद ही रुक्केबााजी कर रहे थे, और हुश्ना ने ही उनसे कहा होगा कि वो मनिहारिन है और उसका निकाह अली साहब से नहीं हो सकता, पर हमारे दिल फ़ेंक अली साहब इस तरह की कहानियां बनाने और सुनाने में माहिर  थे, सुनने वाला चाहे कोई भी हो , उनकी तारीफ़ में कसीदे पढ़िए और तर मॉल खाइये । 

बाद में घर लौटते समय बजरंगी की दूकान से एक अदद मीठा पान खाकर अपने-अपने घर को रुखसत हुए 

अली की कहानी अगले अंक में --------------------तरदा 

Saturday, 22 November 2014

माछाक आन



पहाड़ के गाँव में मिठाई की शुरुवात कब और किस रूप में हुई थी इसका बहुत पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता । पर एक बात तो तय है कि आज से साठ साल पूर्व भी हमारे गाँव में लाडू के रूप में यह हुआ करती थी । शादी ब्याहों में ढेरों लाडू सुंवाल बनाये जाते थे, जो सभी को उपहार के रुुुप में भी दिए जाते थे , जिन्हें  लोग बड़े चाव के साथ खाते थे । आजकल सुवाल  पथाई रस्म  के रूप में मनाई  जाती  है , आजकल की पीढी इन सुंवालों  को क्या खाती है ? लाडू के अलावा मीठे में गुड की डली हुआ करती थी , जिसका  'टपुक ' लगा लोग चाय सुड़कते थे । कभी कोई किसी का रिश्तेदार अल्मोड़ा जैसे शहर से आता तो वह अवश्य ही बाल मिठाई लाता , जो सामान्य लोगों के पहुँच से दूर ही थी । लेमन ड्राप्स को विलायती मिठाई कहा करते थे जिसे केवल बच्चे ही खाते थे , बड़े बूढ़े इसे कतिपय कारणों से खाने से परहेज करते थे । इसके अतिरिक्त और कोई मिठाई प्रचलन में नहीं थी ( यह पहाड़ के समवित्तीय ग्रामों का चित्र  था )  । 

बात वर्ष १९६४ के करीब की होगी ,बाबू , रानीखेत में फल उपयोग विभाग में कार्यरत थे , उन्हें Cost & works Accountancy  के कोर्स के लिए छह महीने के लिए कलकत्ता भेजा गया , वे वहां कोर्स कर रहे थे जब उनकी मुलाक़ात 'कालासिला  ' के बृजमोहन जी से हुई , वे गाँव आ रहे थे , बाबू ने उनके मार्फ़त दो डिब्बाबंद रसगुल्ले , एक रानीखेत हम लोगों के लिए और दूसरा  गांव  बजेत (वर्षायात ) ,बड़बाज्यू लोगों के लिए भिजवाया } गाँव में आमा , बड़बाज्यू, बड़े चाचाजी का परिवार रहा करता था , जिस समय की यह बात है, बड़े चाचाजी , टूर पर निकले हुए थे । बड़बाज्यू किसी काम के सिलसिले में कालासिला गए हुए थे , वहां उनकी बृजमोहन जी के पिताजी से मुलाक़ात हुई उन्होंने, ब्बड़बाज्यू को बुलाकर कहा ," अरे भबन दत्त ! बृज कलकत्त बटी ऐ रौ , वां वीक भेट तयार च्याल मोहनक दगड भैछ, मोहनैलि  त्यार लिजी मिठै भेजि राखी , लि जये ! " एक झोले में  मिठाई उन्हें थमा कर वो अन्य बातों में मशगूल हो गए । शाम को बड़बाज्यू जब घर आये तो उन्होंने आमा से कहा " मोहनैलि  कलकत्त बटी मिठै भेजि राखी !' और झोले से डिब्बा निकाला , पहले तो वे चमत्कृत हो गए  कि मिठाई  किसी टीन के डिब्बे में भी भेजी जाती है , क्योंकि बाल मिठाई तो वे गत्ते  के डिब्बे में ही देखते थे , अब डिब्बा देखकर सारा परिवार बड़बाज्यू को घेर कर बैठ गया }

आमा , चाची से : के हुनल तौ दुल्हैंणि ? 
चाची  : पत्त नै ! 
बड़ी बहिन : तो डाब में के  बणी  छू  ?
मझली बहन : एक ठुल्ला जुंग वाल मैस बणी छ दिदि , खाप में आन जा                           खितनौ 
बड़ी बहन : छि छी: त माछक आन हुनाल , कलकत्त तरफ माछ खानन                       बल ! 
बड़बाज्यू  : चणी रौ ! जस तुई जै रै छै कलकत्त ! नै  खै जैली होय 
छोटा भाई  ( जो छोटा होने के कारण उस गोल तक नहीं पहुँच पा रहा था ) : ओ , बड़बाज्यू ! मैं कत्ति बैठूँ ? 
बड़बाज्यू  (खीजते हुए ) म्यार ख्वार में बैठ ! 
( और सचमुच वो बड़बाज्यू की पीठ पर चढ़कर सर पर बैठने लगा )
बड़बाज्यू ने उसे  धकेलते हुए कहा : पर हट रे ख्वार चढ़ी नानतिन ! ,

डिब्बे में जो कुछ भी लिखा हुआ था वह बंगाली में था , किसी के कुछ समझ में नहीं आ रहा था , बड़बाज्यू ने  आमा से कहा , ला पै दराती लौ और सिलौक लोड़ ले ली आये , अब बड़बाज्यू ने दराती को डिब्बे के ऊपर रख कर बट्टे से चोट मारी तो थोड़ी देर में डब्बे का एक सिरा हल्का सा खुल गया , और थोड़ा सा रस बाहर निकल आया , उंगली में  उस रस को लगाया तो वह चिपचिपा जान पड़ा , वे बोले, " के छ यो लिस जस ? बड़ी बहन की तरफ उंगली बढ़ाते हुए बोले, "ले चख धे के छ यो ?" बड़ी बहन चिल्लाकर भागी ' न ! न!!! न मैं नि चखन तौ " तब बड़बाज्यू ने छोटी कीऔर उंगली बढाई और उसे जबरदस्ती चटा दिया , फिर बोले ," कस हैरयोछ ?"
छोटी ने उत्तर दिया , " गुलिओ गुली है रयोछ  ! त डाब आजि खोलो धे, भितौर  के छु ? बड़बाज्यू ने डिब्बे का पूरा ढक्कन खोल दिया , अब सबने देखा कि उसमें सफ़ेद रसगुल्ले तैर रहे थे , बड़ी बहिन जो दूर से ही सारा तमाशा देख रही थी वह वहीं से चिल्लाई , " त माछाक आन छन , मैंलि  पैलिये कै  हालि  छी , खितौ तनन भ्यार "  । अब स्थति थोड़ी विचित्र हो गई थी , बड़बाज्यू असमंजस में थे, वो सोचरहे थे कि उनका पुत्र यह सब नहीं कर सकता, या तो डिब्बा ही बदल दिया गया है या यह मिठाई ही है , पर इसे चखा या खाया कैसे जाय, बिना उनकी आज्ञा से आमा और चाची भी खाने की हिम्मत नहीं कर सकती थीं । खैर ! छोटे बच्चों ने इसे चाव से खाया, एक ने कई पीस उदरस्त किये । गाँव में छोटी सी बात भी बच्चों के माध्यम से जंगल की आग की तरह फ़ैल  जाती है, बच्चे पेट में बात पचा ही नहीं पाते, छोटी बहिन दौड़ती हुई बाहर आई और बगल के घर में घुस गई, और अपनी समवयस्क सहेली को कोने में लेजाकर कान में बोली, " हमार जिठबाज्युनैली  कलकत्त बटी माछक आन भेज राख्यान औरै गुली हैरयांन , खाली ? " कौतूहल  के कारण वो हमारे घर जाकर रसगुल्ला खा आई , और उसने पूरे गाँव के बच्चों में यह जाग जगा दी और इस तरह देर शाम तक सारे रसगुल्ले खत्म हो गए । बड़बाज्यू चाहते ही थे कि यह समाप्त हो जाएँ , क्योंकि कोई बड़ा बूढ़ा तो इसे खायेगा नहीं और ताने अलग से मिलेंगे । 

पर बड़बाज्यू जो सोच रहे थे वह जल्दी ही हो गया ,  गए रात तक यह बात गाँव के सभी लोगों को हो गई थी । सुबह बड़बाज्यू स्नान के लिए धारे पर  गए तो उन्हें वहां बड़े बड़बाज्यू ( उनके ताऊ जी के पुत्र ) मिल गए उन्होंने बड़बाज्यू को फटकारते हुए कहा , " किलै रे भबन दत्त  ! त्यार  च्यालेल  कलकत्त बटी माछक आन भेज्यान  बल, और त्वील  सब नानतीनां कण खवै द्यान  बल !  , कस मैस भये तू ,! धरम भ्रष्ट करि हालि त्वील  पुर गौंक !  सयाण  है बेर ले त्वील तस करि , निखद्द मैस भये ला !! , बड़बाज्यू , सुणौ  ! सुणौ !! कहते रह गए पर , बड़े बड़बाज्यू उन्हें झिटकते हुए बोले।  " आज बटी जन  लाग्ये मैंकनि , अलीत  कां  को " 

शाम को कालासिला से , बृजमोहन जी का चचेरा भाई आया और उसने एक चिट्ठी बड़बाज्यू को देते हुए कहा, " भबन का ! बेली  तुम यो चिट्ठी भूलि गया ! दाज्यूनैली भेजी राखी " बड़बाज्यू ने तह की हुई चिट्ठी खोली और  उसे पढने लगे , चिट्ठी में बाबू ने रसगुल्लों के बारे में विस्तार से बताया था कि ये दूध को फाड़कर बनाये जाते हैं और इन्हें ब्रत  त्योहारों पर भी खाया जा सकता है, ये काफी दिन तक चलते हैं " यह पढ़कर बड़बाज्यू शून्य में ताक रहे थे और चिट्ठी  उनके हाथ में फड़फड़ा रही थी । 

उधर दिन में बड़े बड़बाज्यू पार वर्षायत किसी काम से गए थे तो उन्हें वहां तारा दत्त बड़बाज्यू मिल गए, आपस में अन्य  फसकों के अलावा पिछली रात को गाँव में हुए काण्ड की भी जानकारी उन्होंने तारा दत्त बड़बाज्यू को दी, (तारादत्त बड़बाज्यु बहुत साल बनारस में रहे थे , वे वहां बी एच यू में संस्कृत के प्राध्यापक थे और मालवीय जी से कुछ मनमुटाव होने के कारण  वे छोड़ कर गाँव वापस आ गए) + वे पूरा मामला समझ गए और हँसते हुए बोले , "पगल बजी रौछै तू ! अरे ऊ माछक आन  नि भ्या  ! ऊ रसगुल्ल भ्या , बंगालि  लोग खानेर भ्या !" हतप्रभ हुए बड़े बड़बाज्यू घर लौटे , पर वे अपनी हार न मानने वाले थे , घर पर बड़बाज्यू को  सब लोगों के सामने देखकर अनजान बन कर  बोले ," हला भबन दत्त ! त्यार च्यालेल  कलकत्त बटी रस्गुल्ल भेज्यान बल , त्वील हमन  नि खवै , कतुक खाना ? " 

अब बड़बाज्यू के बेहोश होने की बारी थी । 

इति 



Monday, 3 November 2014

जाड़ों के दिन



रमा को सड़क के किनारे पिलपाई पर बैठे हुए बहुत देर हो चुकी थी , उसने सड़क के किनारे भीड़े से हेमा को उतरते देखा तो वह वहीं से चिल्लाई "  हद्द हाण  दी तूने तो यार !! भौत्ती देर कर दी तूने तो ! में कब से यहां बैठी ठैरी और ये मैरानी अब आ रहीं ठैरी  ! "
हेमा, " क्या करूँ यार ! मेरे घर में भी न , कोई काम नहीं करता, हाँ नहीँ  तो !           कल स्कूल से आई तो ईजा  ने कहा बर्तन माज़ दे , मैंने माज दिए               फिर पढने बैठ गई , बाद में ईजा ने डाँट  लगाई ,,,,,,,,
रमा : क्यों ?
हेमा : बर्तन किसी ने भी टांजे नहीं ठैरे ,,,
रमा : क्यों ? तेरी छोटी बहन नहीं टांज  सकती थी क्या ?
हेमा : अरे यार , उसकी भली चलाई , कल शाम उसको ईजा ने छत से                   कपडे उचाने के लिए  कहा होगा , उन मैरानी को इस पर गुस्सा आ             गया , उसने छत से कपडे उचाकर  इधर उधर फोक दिए , अब सूबे                मेरी सलवार नईं  मिल री ठैरी , सारे घर में  ढुनादून  मच गई ठैरी ,            तब जा के  ट्रंक  के पीछे मिली , गुजमुजा कर फेंकी ठैरी उसने ,,,,
         ईजा ने उससे कुछ नहीं कहा , लोटे में लाल कोयले रख कर सलवार            में प्रेस  कर दी ,,,,,,
रमा : मैं तो अपना काम खुद देखती हूँ ,, किसी के भरोसे क्या रहना ठैरा ?
हेमा : तेरे घर में मेरी रेखा जैसी बहन नहीं ठैरी ना ! तबी तू इतरा री ठैरी ,,
रमा : अरे ! तू तो सलवार के ऊपर से ही जुराब हाल लाई ! सब हसेंगे रे ! 
हेमा : हसें  मेरी घुत्ती से , हाँ नहीं तो ! ईजा ने कहा था कि , जोते से                   ठोणी  लगेगी करके ,जोंतों के तलौटे पतले हैं करके। ....... 
रमा  : चल अब जल्दी जल्दी , दूसरी घंटी भी बज गई होगी , और ढील होगी तो जीबन्ती मास्टरनी गेट पर ही संटी  लिए मिलेगी ,,
हेमा : हाँ रे ! सीधे पैरों पर ही मारती है चुड़ैल , इसको थोड़ी भी दया ममता नहीं है रे ! ,,
रमा : कहाँ से होगी ? अपने बच्चे होते तो बच्चों के बारे में कुछ समझती !
हेमा : क्यों रे ! इसके कोई संतान नहीं है क्या ?
रमा : तो क्या में झूठ बोल रई ठैरी ? मेरे दाज्यू बता रे ठैरे एक लड़का था वो भी मर गया करके ,,,,,,,
हेमा : पैरों में संटी मारते समय ये भी नहीं सोचती बेशरम कि इस जाड़े में हम लोगों को कितनी लगती होगी, कोई इसे भी मारे तो पता चले चुड़ैल को , हाँ नहीं तो ! 
रमा : उसे कैसे पता चलेगा ? देखती नहीं है वह बिलौज के ऊपर हाफ स्वेटर, उसके ऊपर फूल स्वेटर, उसके ऊपर शॉल ओढ़े रहती है, इसके इलावा वो क्लास में सगड़ भी जलवाती है बल ,,,,,,, 

अब ढलान के पास स्कूल आ रहा था, पता नहीं कौन सी घंटी बज चुकी थी, लड़कियों की भिन्न भिन्न सुनाई दे  रही थी , दोनों सहेलियां कुलाचें भरती प्राथना सभा की और भाग चलीं  । 
                                                                                                  

Monday, 22 September 2014

नशा

नशा 

अनवारे- रब है जिसमें , रंगो- बू नहीं है ,
तेरे नूर से लबालब तेरे नाम का पियाला  ॥ 

शाहिद जगह बता दे जिस ठौर छुप  के पी लूँ ,
जिस जगह नज़र है जाती , तेरा ही बोलबाला ,
तेरे नूर से लबालब तेरे नाम का पियाला  ॥ 

है रूह सबसे हलकी ,   भारी बहुत जेहन है ,
तालीम  जिंदगी भर  रहती  है  पाठशाला 
तेरे नूर से लबालब तेरे नाम का पियाला  ॥ 

अंगूरी ये नहीं है  , जो तोड़  जिस्म रख दे ,
ये  सुरूर है रूहानी , मस्ताये पीने वाला ,
तेरे नूर से लबालब तेरे नाम का पियाला  ॥ 

पतली  डोर से साकी ,मुझे चाहे बाँध रखना ,
खिंचता  चला चलूँगा , रक्खी जहां ये हाला ,
तेरे नूर से लबालब तेरे नाम का पियाला  ॥ 

~~~~~~~~ तरदा 


Friday, 19 September 2014

नायिका




गोरिया निहुरि  निहुरिकै , बुहारै  अंगना ,
बुहारै अंगना हो बुहारै अंगना .......... गोरिया ,,,,,

हाथ गोरी के चुड़ियां सोहै ,
रुन - झुन के खनकावै  कंगना ,
खनकावै कंगना हो खनकावै कंगना …… गोरिया ,,,,,,

पैर गोरी के पायलिया छाजै ,
छन - छन  छनकावै पैजनियाँ ,
छनकावै पैजनियाँ हो छनकावै पैजनियाँ ,,,,,,,,,,,गोरिया ,,,,

अंग गोरी के लहंगा सोहै ,
फर - फर के रिझावै सजना ,
रिझावै सजना हो रिझावै सजना ,,,,,,,,,,,,,,गोरिया ,,,,,,

नाक गोरी के नथुनी सोहै ,
चम - चम , चमकावै नथुनियाँ ,
चमकावै नथुनियाँ हो चमकावै नथुनियाँ ,,,,,,,,गोरिया ,,,

कंठ गोरी के मोति -  हार विराजै ,
हेर्री -हेर्री -हेर्री हरषावै बलमा ,
हरषावै बलमा हो हरषावै बलमा ,,,,,,,,,गोरिया ,,,,,,




Thursday, 18 September 2014

विरहणी 

ओ , को छै तु  ! को छै , तसिकै नि आई कर ,
म्यार बेलम कनी , तसिकै नि झस्काई कर  ॥ 

अब बस  फाम रैगे , नि  लागन म्योरो मन ,
भूली गयूं द्याप्तन , भूली गयूं  मै - बाबन ,
मैं  अभागी  कनि  तसिकै  नि बोतयाई कर 
ओ , को छै तु  ! को छै , तसिकै नि आई कर ॥  ॥ 

ऊखल की धम -धम , मड़ुवौ  को मानणा ,
ग्यून में फटक लगूण , निंबुओ  को सानण ,
इथकै - उथकैकि सुनै  मैकणी नि अल्झाई कर ,
ओ , को छै तु  ! को छै , तसिकै नि आई कर ॥   ॥ 

lyrics available for music composition pl contact 

(बेलम - किसी तरह काम में मन लगना , झस्काई - डराना ,फाम-याद ,द्याप्तन -देवताओं को , बोतयाई-बहलाना , ऊखल -अनाज कूटने का पत्थर में चौड़ा छिद्र , मानणा  - पैरों से रगड़ना , फटक -बड़े चौड़े कपडे से फटकना , अल्झाई - उलझाना )

Monday, 15 September 2014

भूत 

घर हूँ बाट  लागी भयूँ  कूंछा , पहाडनक बाट भै  त , अत्ति पटै  लागिगै , एक ठुल्लो   पीपलॉक बोट  दिखीण त मैल सोचि कि चलो येक  तली बैठ , पटै बिसै ल्यूँ  कबेर । बैठण जाणे , म्यार आँख लागि गै कूँछा  । थ्वाड़  देर  बाद मैंकनि एस लागौ जस क्वे डाड मारनौ , हीं  ! हीं !! हीं !!!  कबेर क्वे टिटाट करण लागि रै  कूंछा , अलबलाने मैं ठाड़  भयूँ , तालै चाछौ , मली हांगन मैं कतुकै भूत , चमगादडन जस  उल्ट लटकी भै  ।  बुड भूत , ज्वान भूत , ठुल भूत , नान भूत , सैंणी भूत , बैग भूत ,ट्याड  भूत , बाँग भूत , म्वाट भूत ,लित्तड़ भूत , लम्ब  भूत ,गाँठि भूत  सब प्रकारक भूत लटकी भै । उनर सभा चली भै  ! एक  बुड भूत  स्याँक -स्याँक  करिबेर , बाकि सब भूतन हूँ कूँण लागि , " अरे डाड नि मारौ रे  ! मेरि बात सुणौ , यो बताओं कि अब के करी जा ? यो मैस त अब हमन देखि डरन  नि हैतन , इनार नानतिन ले नि छॉलीन , नई ब्याकि ब्योलि कनि ले गाड़ पार करण में परि नि लागनि , बताओं  अब के करि जा ? 
एक जवान भूत आपुन हांग छोड़ि बेर , बुड भूतक  हांग में लटकि बेर कूँण लागि , भूत मैराज ! अगर मैंथें पूंछछा त , म्यार हिसाबेलि यो हमारि ग़लती छू , हम आपुंण ब्या काज में लागि भयां , याँ नई भूत ऐ गईं , एक ऊ ओसामा बिन लादेन छ वील सब भूतन  कनि  डर मान करि राखौ , कि अब ऊ भूतनक खलीफा छ  कबेर , अब हमार बुड़बड़बाज्यू डरि  ग्याय , ऊ कुनेर भै , अब दूसर काम देखो कबेर , तब मैस  कसी डराल  ? " 
"तु ठीक कुनौछे  भुला " बुड भूतैलि  कौछ , " पर अब यो बताऔ कि के करि जै  सकैछ " 
एक तिसर पढ़ि लिखी  भूत , जो मलियाक हांग में लटकी छी , ऊ सट्ट  तली आछ , और उल्ट लटकि बेर बुद्ध भूत थें कूँण लागि , " भूत मैराज  ! मेरि सुंणछा  तौ  म्यर  हिसाबेलि  हमन कनि सरकार थें आपुनि बात कूँण चें , हम सब भूतबंधु सरकारैक पास डेपुटेशन लि बेर जानूँ , और  आपुनी मांग धरून , हमन कूँण पड़ल कि हमार बीच में आतंकवादी भूत ले आई गईं , यो सरर्कारैकि जिम्मेदारी  छ कि हम भूतन कन , यो आतंकवादी भूतनक , आतंक थें बचाओ  !" 
"पर ऊ लोग ले त  मैस छन , उ हमन कनि कसी देखाल ?" बुद्ध भूतैल प्रश्न करौ , " हमन कन साधारण मैस नि देख सकन भुला  ! पाथर में ख्वोर मारण जस है जाल !" क्वे दूसर उपाय बताऔ !! 
पढ़ी लिखी भूतैलि  फिर आपुनि बात धरी ," हमन कनि क्वे देखो या नि देखो , पर हमार बिरादर जरूर देखाल , और ऊ झट्ट हमन कन  जेड सिक्यूरिटी  दि दयाल  ! " 
" किले रे ! को छ हमर बिरादर वां सरकार में ?" बुढ भूतैलि  पुछो  । 
" अरे मैराज !! सब नेता हमर बिरादर छन , उन्हन  थें ठुल भूत क्वे छ बल ?" 
एतुक  सुणी  बेर , जोरोक  फडफडाट  भॉछ और सबै भूत दिल्ली तरफ उड़ि ग्याय , और मैं ले आपुण घर हूँ बाट लागि गयूं  ।