पतंगें
गर्मियों के दिन थे, दूकान से गेहूं लाद कर मुन्ना चक्की वाले के यहां तुलवा कर पिसवाने धर कर घर को लौट ही रहा था कि रस्ते में अली साहब मिल गए , मैंने आदाब किया तो बोले " जीते रहिये मियाँ ! किधर चल दिए ?"
मैंने कहा : घर जा रहे हैं भाई जान !
अली साहब : अमां चलिए ! आपको चौक तफ़रीह करा लाएं , अपनी अम्मी को बोल दीजिये कि घंटे दो घंटे में वापस आ जायेगें
मैंने कहा : ठीक है भाई जान अभी कह कर आता हूँ
अली साहब : आगे की नुक्कड़ पर मिलिए मैं कुछ सामान ड्योढ़ी से ले लूँ
करीब दस मिनट बाद वो एक बहुत बड़ा चमड़े का बस्ता नुमा बैग लेकर ड्योढ़ी के फाटक पर नमूदार हुए , बड़ी मुश्किल से वह बैग उठा पा रहे थे, मैंने लपक कर बैग का दूसरा सिरा सम्भाला, वो हांफते हुए शुक्रिया बोले " चलिए इक्का स्टैंड तक की मशक्कत है "
इक्का स्टैंड पहुँच कर जैसे ही हमने बस्ता नीचे रखा, तभी दो तीन इक्के वाले सामने आये और अली साहब से बोले : आदाब , नवाब साहब ! , हुज़ूर आपका इक्का बिलकुल तैयार है ।
दूसरा बोला " अरे हुज़ूर ! सुबह से आपके ही इंतज़ार में बैठे हैं, घोड़ा तो आपके कदमों की आहट के बिना पैर उठता ही नहीं
तीसरा : अरे हुज़ूर ! हमें भी कदम्बोशी का मौक़ा फरमाएं , पिछली बार आपने हमारे इक्के को तरजीह क्या दी , ये घोडा आपकी ही राह देख रहा है, कसम से उस दिन के बाद कोई सवारी ही नहीं उठा ने दी इस बदजात ने
( दरअसल सभी झूठ बोल रहे थे , उन्हें इमकान था कि अली साहब अपने नवाब खानदान से होने की लंतरानियां हाँक रहे थे , उनमें जो सबसे जवां था उसने अली साहब का बैग उठा कर अपने इक्के पर लाद दिया और अपने गमछे से इक्के की गद्दी को झाड़कर बोला : कदम बढाइये हुज़ूर , इक्का आपकी कदम बोशी को बेताब है "
बड़ी शाइस्तगी ने अली साहब ने अपने पैर उठाकर इक्के पर रखे और मुझसे बोले चढ़े चले आइये मियाँ । मैं भी उचक कर अली साहब के बगल में बैठ गया , ठुक ,,ठुक. . ठुक कर इक्का अपनी शान से चल पड़ा , रास्ते भर इक्के वाला अली साहब से तरह तरह के सवालात करने लगा , जैसे कि हुज़ूर की मिलकियत किधर किधर है , हुज़ुर कभी लगन वसूलने जाते हैं कि नहीं , वगैरह, वगैरह। . अली साहब भी लम्बी लाबी हांकने लगे , तभी चौक की गलियां दिखने लगीं तो अली साहब ने इक्के वाले से कहा " आप यहीं इंतज़ार करें, हम अभी काम निपटा कर आते है,, ज़रा बैग उतारने की जहमत कीजियेगा " और इक्के वाले ने बैग उतार कर इक्का किनारे लगा दिया ।
हम दोनों ने बैग को सिरों से पकड़ा और अली साहब आगे आगे चल पड़े, गली तंग होती चली गई , और मुहाने पर तो लगता था कि बिलकुल बंद हो गई है. मगर एक नाला पार करने के बाद एक दूकान पर अली साहब रुके और जोर से आवाज़ लगाए " अब्दुल मियाँ ! " और एक आदमी चिक उठाकर दूकान से बाहर आया और अली साहब के हाथ से बैग उठाकर दूकान के भीतर ले गया , मैंने देखा दूकान के बाहर बड़ा सा साइन बोर्ड लगा हुआ था जिस पर लिख था " अली पतंग वाले ", शानदार,पतंग, कड़क मंझे, और लचीली शद्दी की दूकान, हर काम तसल्लीबख्श , एक बार ले जाइए बार बार आइये, वग़ीरह....वगैरह , अली साहब बोले सारी जानकारी बोर्ड से लीजियेगा या भीतर भी चलिएगा"
अली साहब के साथ मैं चिक उठाकर भीतर गया वहा का माहौल दूसरा था, चारों और खस की टट्टियां लगी हुई थीं, गुलाबजल की महक सारे आलम में फैली थी, ऊंची मसनद पर बड़े अली शानदार चिकन का कुर्ता पैजामा पहने हुए तशरीफ़ रखे हुए थे, मैंने उन्हें देख कर आदाब किया वे बोले" जीते रहो बरखुरदार !! तशरीफ़ रखिये, और मोहम्मद को आवाज़ दी कि बच्चों की नवाज़िश करें , थोड़ी देर में मोहम्मद। लस्सी, सेवईं, और कुछ फल ले आये , मैं और अली साहब उसे बहुत शालीनता से खा रहे थे वो बड़ा चमड़े का बैग हम लाये थे उसमें करीब पचास बड़ी पतंगें करीने से रखी हुई थीं , हर पतंग के नीचे एक तह अख़बार की थी, जिससे किसी पतंग के मुद्दे या काँप से दूसरी पतंग फट न जाए , दूकान के भीतर की और लटाईयां ( चकरियां) लटकी हुई थीं, कोई मांझे से भरी, कोई शद्दी से भरी, कोई बिलकुल खाली, सभी लटाईयां,,नक्काशीदार और शानदार रंगों से सजी हुई थी,, रैक पर नमूने और साइज वार पतंगें धरी हुई थीं, शायद एक या दो बल्ब जल रहे थे मगर सभी चीजें बिलकुल साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थीं , फिर बड़े अली ने हुक्म दिया, " मेरे बच्चो !, अब यहां से सीधे घर का रुख कीजियेगा, बाहर तपिश है, ज्यादा खुले में बीमार पड जाइयेगा ।
अली साहब बोले : अब्बा हुज़ूर ! हम इका ले कर आये हैं , वो नुक्कड़ पर हमारा इंतज़ार कर रहा है"
बड़े अली : ठीक है : ये लीजिये , पांच रूपये, दो= दो आपस में बाँट लीजिये और एक रुपिया इक्के वाले को उसजी उजरत दे दीजियेगा , अब देर न कीजिए "
बाहर निकल कर अली साहब मुझसे बोले मियाँ आप नुक्कड़ की तरफ कदम बढाइये, में एक काम निपटा कर आटा हूँ", इतना कह कर वो लपक कर एक गली में घुस गए, मगर मैं भी उन्हें इतनी आसानी से छोड़ने वाला न था, उनके पीछे पीछे में भी उस गली में घुस गया , देखा तो एक छोटी सी दूकान की चिलमन उठकर किसी से बात कर रहे थे, " अजी आज बड़ी मुश्किल से मौक़ा मिला है , अब्बाजानी तो हमारे पीछे अय्यारों की फ़ौज लगा देते हैं , , भीतर से जनानी आवाज़ खखनाई, " जाएये, जाइए,! बहाने खूब होते हैं, आप मर्दों के पास , बताइये ये बंदी क्या कर सकती है आपकी खिदमत में "
अली साहब : अब यूं न खफा होइए , आप हमारी रानी हैं बांदी नहीं , आज रुक्का लाना भूल गया , चलिए बाद में ही सही, ये बताइये ! ये सिलसिला आगे कैसे बढे ?
आवाज़ : अब हम क्या बता सकती हैं , हम औरत हैं जो कुछ करना है आप कीजिए, चाहे हमारे अब्बाजान से बात कीजिए या अपने ! जल्दी पहली फुरसत में कीजिए, नही तो मौक़ा हाथ से जाने का अंदेशा है !
अली साहब : वो क्यों ?
आवाज़ : मगज़ है आपके पास ? पिछली बार ही कह चुकी हूँ कि मेरे निकाह की बातें चल रही हैं घर पर
अली साहब : आप बिलकुल फिक्र न करे, जब आपने हमें अपना दिलबर माना है तो ये हमारी जिम्मेदारी है,
तभी घर कर भीतर से जोर की आवाज़ आई " हुश्ना ! किससे बतिया रही हो ?"
हुश्ना : गाहक से अम्मी, फिर फुसफुसा कर बोली, अब निकल लो दिलबर ! खामखाँ दूसरी नौबत न आन पड़े
और अली साहब झपटते हुए चिक उठाकर बाहर निकले और यह जा व्ह जा , इस दरम्यान उन्होंने मुझ्र भी नही देखा , मैं भी उनके पीछे कदम बड़ा कर चल दिया, वो यूं घबराये हुए थे जैसे उनके पीछे कोई भूत पड़ा हो, नुक्कड़ तक हम साथ साथ पहुंचे, वो मुझे ढूँढ ही रहे थे कि मैं उनके सामने आ गया ।
मैं : कहाँ रह गए भाई जान बड़ी देर कर दी ?
अली साहब : कुछ नहीं कुछ फरोख्त का मामला था, आपकी समझ में न आएगा , चलिए इक्के पर तशरीफ़ रखिये
रास्ते भर अली साहब बताते रहे कि उनके कितने बाग़ हैं , कितनी मिलकियत मकानातों की है जिससे हर महीने किराया आता है , वगैरह, इसमें वह पतंगों के व्यापार को गोल कर गए , इक्का स्टैंड पहुँच कर अली साहब ने रिक्शे वाले को एक रूपया देकर आठ आने वापस करने को कहा तो इक्के वाला कुछ झक झक करने लगा, बाद में बारह आने में माँन गया, घर की गली की तरफ चलते हुए मैंने उनसे पूछ " ये क्या बात हुई भाई जान आपने तो हद कर दी अपनी असल मिलकियत ये पतंगों का कारोबार नहीं बतलाया इक्के वाले को
अली साहब : आप समझते नहीं हैं मियाँ, ये गरीब लोग हमेशा कोशिश करते हैं कि हमसे कुछ न कुछ झटक लें , मगर आप इतने पशो पेश में क्यों हैं मियाँ ?
मैं : मैं नहीं जानता था कि आपका पतंगों का भी व्योपार है, यह तो खुशी की बात है, इससे तो अच्छी आमदनी हो जाती होगी ?
अली साहब : कुछ लोग इसे नीचे दर्जे का काम समझते हैं, इसलिए अब्बा हुज़ूर ने ड्योढ़ी के तहखाने में इसका कारखाना खोला हुआ है , इसके सारे कारीगर गुशल वगैरह कर मुंह अँधेरे आ जाते हैं, भरी दोपहरी में अपने घर जाकर खाना खाकर वापस आ जाते है, शाम को शम्मे जलने वक्त घर चले जाते हैं, इसलिए महल्ले में किसी को पता नहीं चलता
मैं : चलिए भाई जान ! आज आपका कारखाना भी देख लेते हैं
अली साहब : जाहे किश्मत ! आइये तशरीफ़ लाइए
हम लोग ड्योढ़ी पहुंचे , गेट के बगल से ही नीचे को जाती सीढ़ियां दिख रही थीं, जो इस हिस्से में कल्लू धोबी के गधे बंधे होने की वजह से दिखती नहीं थी ,हम सीढ़ियों से निीचे उतरे दो मोड़ उतार के बाद ही सामने बहुत बड़ा हाल नमूदार हुआ , जिसके एक कोने से दूसरे कोने तक मोटे डंडे लगे हुए थे जिन पर इस पार से उस पार तक धागे लिपटे हुए थे , एक कोने पर बड़े बड़े कड़ाहों में न जाने क्या उबल रहा था , दूसरे कोने में एक बहुत बड़ी खडी चक्की में न जाने क्या पीसा जा रहा था, हाल के गलियारे में इस कोने से उस कोने तक पतंगें बन रही थीं
अचंभित हुआ मैं अली साहब से बोला : वाह भाईजान ! ये तो बहुत बड़ा कारखाना है , इतने साल हो गए कभी गुमान भी न हुआ
अली साहब : यही शिफत तो है अब्बा हुज़ूर में ! अब देखिये दसियों साल साल से ये कारखना आबाद है , छुनर पंडित जी के आलावा शायद ही किसी को पता हो ,आइये आपको सब कुछ दिखाएँ
१) ये देखिये ये पतंगों का कारखाना है, पतंगी कागज़ दिल्ली और कलकत्ते से मंगवाए जाते है ,इन कागजों के दस्तों को इस बड़े क़टर पर रख कर बड़ी नफासत से काटा जाता है ,फिर सिलसिलेवार हर कटे टुकड़े पर चारों और से पतला धागा ऐसी सगाई से चिपकाया जाता है कि सामने से देखने पर पता न चले इससे कागज़ की तंदुरस्ती बढती है , फिर इसकी घुटाई होती है और कागज़ पतंग बनने को तैयार है
२) ये जो बांस की फंटियां देख रहे हैं, ये मामूली नहीं हैं, खीरी के जंगलों से बांस मगा कर खपच्चियाँ बनाई जाती हैं, , फिर ये सामने वाली मशीन पर पतंग के काँप बनाये जाते हैं ( मैंने देखा कि वर्नियर कैलिसपर की तरह का एक मापक इन पतले पतले कांपों को बार-बार माप कर तराश रहा था ताकि जब तक ये हमवार न हो जाएँ , एक जहींन कारीगर इन्हें हाथ से छूकर , तसल्ली होजाने तक परख रहा था, फिर एक मर्तबान में इन्हें डाल देता ) कुछ कारीगर पतंगों के मुद्दों केलिए छोटे छोटे टुकड़ों से तीलियाँ तैयार कर रहे थे
३) अलीसाहब बोले " ये जो बड़े कड़ाह में उबाल रहा है वह सरेस है , ये यूँ ही नही उबाल जा रहा , इसमें कांच के बारीक टुकड़े भी डाले गए हैं,
४) आगे दिखाते हुए वे बोले ये देखिये ये कांच को बारीक पावडर जैसा पीस रहे हैं , ये कोई आम कांच नहीं हैं , ये बेल्जियम ग्लास के टुकड़े हैं जिन्हें अब्बा इतवार को नक्खास से खरीद कर लाते हैं, कुछ कबाड़ी वालों से भी खरीदा जाता है
मैंने कहा : बेल्जियम ग्लास ? वो कहाँ मिलता है ?
अली साहब बोले : पुराने झाड़ फानूस, नीले या भूरे रंग की कांच की बोतले, आम काचों से ज्यादा मजबूत होती हैं , इस पावडर को सरेश में मिला दिया जाता है, और वो देखिये उन खम्बों की जानिब, ये सरेस कई मर्तबे इन धागों पर लेप दिया जाता है , सूखने पर कडकडार मांझा तैयार होता है, जो " अली का मांझा " नाम से शोहरत पाया हुआ है , अच्छे पतंग बाज इस मांझे की बड़ी कद्र करते हैं
मैंने फिर पूछा : भाई जान ! इतनी बड़ी पतंगें आखिर कार बनती कैसे हैं ?
अली साहब बोले : पतंगी कागज तैयार होने, बांस की काँप और मुद्दे तैयार होने के बाद पतंग को इतनी सलाहियत से बनाया जात्ता है कि एक पतंग बनाने में करीब एक घंटा लग जाता है , तब तैयार होती है " अली की बेमिशाल पतंग", जो यहां से चारों और के सभी जिलों में बहुतायत में बिकती हैं , ये वो पतंग है जो एक ठुनकी ( इशारे) पर अपना करतब दिखाती है, ।
मैंने कहा : भाई जान ! शद्दी और लटई भी बिक रही थी दूकान में
अली साहब : जी हाँ ! वो भी "अली " के नाम से बिकती है, जो बांस की खपच्चियां बच जाती हैं उन्हें घिस कर हमवार किया जाता है फिर सहारनपुर से मंगाए चक्के और डंडी में खांचे बना कर लटई बन जाती है, इसे वो हाल के नुक्कड़ पर जमील मियाँ अंजाम देते हैं
मैं : भाई जान ! ये सब तो हुआ, मगर वो चौक में चिलमन के पीछे की कहानी भी सुनाइए !
अली साहब (नकली गुस्से में ) : मियाँ बड़े शरीर हैं आप, पीटे जाएंगे , कभी ! अमां ये सब बातें क्या यहाँ कहने की हैं, मियाँ दीवारों के भी कान होते हैं !
मैंने कहा : माफ़ कीजियेगा भाईजान , अभी तो सवा दो रुपये पड़े हैं हुज़ूर की जेब में क़त्ल हो जाने के लिए, चलिए पांडे की दुकान चलते हैं इसे जिबह करने को !
मेरा इतना कहते ही अली साहब फूल गए और भूल गए कि उसी रुपयों के भाई, ढाई रूपये मेरी जेब में भी पड़े हैं , पांडे की दूकान पर दो-दो समोसे और एक-एक चाय कुल खर्च महज एक रूपया, अली साहब को कोई उज्र न था , मेरे उकसाने पर बोले
अली साहब : मियाँ ! क्या बताएं इस बेदर्द ज़माने को ! वो हुश्ना हमसे मुहब्बत करती है, पर हमारे अब्बा को वह फूटी आँख नही सुहाती है, वो कहते हैं कि मनिहारन की लड़की से निकाह पढ़ कर नवाबी खानदान की इज्जत ख़ाक में मिलाओगे ? , बस एक बार उसने हमें दूकान पर देखा तो अपनी मुहब्बत का इज़हार करने के लिए एक गुलाब में पैबस्त रुक्का हमें फैंक गई, कई दिन तक तो हमारी हिम्मत ही नहीं हुई पर बाद में इत्र में भीगे गुलाब में पैवस्त अपना रुक्का उसकी दूकान पर उसके हाथों में दे आये, तब से सिलसिला चल पड़ा है "
मुझे मालूम था कि यह उनकी कपोल कल्पना थी , दरअसल वो खुद ही रुक्केबााजी कर रहे थे, और हुश्ना ने ही उनसे कहा होगा कि वो मनिहारिन है और उसका निकाह अली साहब से नहीं हो सकता, पर हमारे दिल फ़ेंक अली साहब इस तरह की कहानियां बनाने और सुनाने में माहिर थे, सुनने वाला चाहे कोई भी हो , उनकी तारीफ़ में कसीदे पढ़िए और तर मॉल खाइये ।
बाद में घर लौटते समय बजरंगी की दूकान से एक अदद मीठा पान खाकर अपने-अपने घर को रुखसत हुए
अली की कहानी अगले अंक में --------------------तरदा


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