Sunday, 3 August 2014

अकाल

जैसा कि सभी को ज्ञात ही है , आधे से ज्यादा सावन बीत चुका है और हमारा शहर सावन की रिमझिम के लिए तरस गया है , इस पर मुझे बहुत पहले 'अवधी' का यह गीत याद आ गया :-       

                                                  " काले मेघा पानी दे  ! पानी दे गुरदानी दे !,
पानी बरसे खेत मा, तन मन भीजै मेह माँ ,
बकरी है भूखी बैल पियासे , 
भर गगरी जल लाऊँ कहाँ से  ?
फसल बोवैय्या का उज्जर साफा ,
गोरिया का चूनर धानी  रे ,
या !  मेरे मौला पानी दे, पानी दे गुरदानी दे ! 

सूखी धरती बंजर हुइगै ,
सूख गए सब ताल तलैय्या ,
बिरवन के सब पात झुरसी गए , 
उड़ि गए सगरे  रे चील चिरैय्या  ,
हा हा कार मचे रे बावंडर ,
प्यासी रोवैं  गैय्या मैया ,
बिन चारा के मरियां जनावर ,
बैठी के रोवैं बिरहा गवैय्या ,
बरसे जा बरसाए जा  ! दमड़ी से लगाये जा ,
फसल बोवैय्या का उज्जर साफा ,
गोरिया का चूनर धानी  रे ,................ 
या !  मेरे मौला पानी दे, पानी दे गुरदानी दे ! 

उपरोक्त गीत में कवि ने अवर्षण  की हताशा  को व्यक्त किया है, साथ ही तुकबंदी कर इस बात का अहसास भी दिलाया है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी किसान को दिन बहुरने की आशा सदा ही रहती है }


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