गोयनका जी ने जीवन में बहुत उतर चढाव देखे , एक सामान्य घर में उनका जन्म हुआ , पिता एक कृपण व्यापारी थे, छोटे से कसबे में उनकी परचून की दुकान थी, , परिवार लम्बा था , बहुत कम लोग शिक्षित थे, कुछ जो कसबे में उपलब्ध स्कूलों में शिक्षा ग्रहण भी कर पाये उन्हें अंतत: व्यापर ही करना पड़ा । गोयनका जी के भीतर एक छटपटाहट थी वे इन सब से बाहर निकलना चाहते थे, पिता से जिद कर के वे कसबे से शहर आये और बड़े उन्नत कालेज में शिक्षा ग्रहण करने लगे, पिता उनकी आर्थिक सहायता समय से नहीं कर पाते थे इसलिए वे छोटे क्लासों के विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाते और जीविकोपार्जन करते । इस तरह उनहोंने अपनी परास्नातक की पढाई पूरी की और फिर व्यवसाय से सम्बंधित आगे कि पढाई के लिए स्कालरशिप ले कर विदेश चले गए, वे साहसी और उद्यमी तो थे ही, वहाँ भी उनहोंने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया, और बहुत अच्छे अंकों से विशेषता हासिल कर विशेष डिग्री हासिल की । वापस लौट कर बैंक से आर्थिक मदद ले कर अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया । शुरू के कुछ वर्षों की हानि के पश्चात उनको व्यवसाय में उत्तरोत्तर लाभ होने लगा, परिवार के अन्य सदस्य भी उनके व्यवसाय में हाथ बटाने लगे, धीरे धीरे उनका व्यवसाय विदेशों तक फैल गया । अब उन्हें बिजनेस टाइकून कहा जाने लगा, वो जिस भी व्यवसाय में हाथ लगाते उसमें सोने सी चमक आ जाती । उनका बिजनेस देश के चुनिंदा बिजनेस हाउस में गिना जाने लगा । उनकी पत्नी धर्मपारायण और विदुषी थीं और समय समय पर उनके काम काज में हाथ बटाया करती थीं । उनके पुत्र एवं पुत्रवधू भी उनके इस विशाल बिजनेस एम्पायर में उनके कंधे से कंधा मिला कर काम करते थे । उस नामालूम कसबे से ऊपर उभरा उनका व्यक्तित्व और कृतित्व एक नया आकार ले चुका था । उनके पुत्रों ने विदेश से शिक्षा ग्रहण की थी वे अंतर्राष्ट्रीय तरीकों से सोचते थे उसी प्रकार उनहोंने अपने बिजनेस साम्राज्य को आगे बढ़ाया ।उनकी विद्व्ता एवं अतुलनीय विपणन क्षमता के कारण सरकार ने उन्हें राज्य सभा सदस्य मनोनीत किया ।
अकूत सम्पदा और अतुलनीय वैभव, संतोषजनक सम्मान, सब कुछ प्राप्त हो चुका था, उनहोंने जिस साम्राज्य की कल्पना की थी वो सुदृढ़ रूप से खड़ा हो चुका था, अब उनके करने लायक कुछ भी नहीं था, बच्चे उनसे परामर्श अवश्य लेते थे पर अंतत: निर्णय बच्चे ही लेते थे, वे संतुष्ट थे । शनै : शनै: उन्हें विरक्ति होने लगी, स्व्भाव से धर्मभीरु थे, पत्नी भी इसी स्व्भाव कि थी इसलिए धर्म कर्म में उनकी रूचि बढ़ने लगी । पुत्रों ने उनकी मन:स्थति को भांपते हुए हरिद्वार में उनके लिए एक आलीशान मकान खरीद लिया , वे वहीँ रहने लगे । हर महीने पुत्र उनके पास आते , बिजनेस के बारे में विस्तार से बताते, बड़ा पुत्र भी उनके सामान राज्यसभा में मनोनीत हो चूका था, अब तो सत्ता से भी उनके बिजनेस हाउस का जुड़ाव हो चुका था । अभी भी सारा व्यवसाय उनके ही नियंत्रण में था, पुत्रों की भी कोई इच्छा न थी कि वे नियंत्रण छोड़ें । तभी जीवन में एक विषम समय आया, उन्हें जीवन संगिनी का विछोह सहना पड़ा, पुत्र उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते थे पर वे भविष्य दृष्टा थे उनहोंने अपने को अलग ही रखना श्रेयस्कर समझा । हरिद्वार में वे साधू संतों से मिलने जुलने लगे, उनके सत्संग से उनके भीतर भौतिकता से विरक्ति होने लगी, वे सोचने लगे कि उनहोंने इतने बड़े व्यवसाय की अनावश्यक रूप से जिम्मेदारी ओढ़ रही है । उनहोंने सभी बंधू बांधवों को बुलाया और इस जिम्मेदारी से मुक्त होने की इच्छा व्यक की , बहुत दिनों तक इस मसले पर चर्चा होती रही, पुत्र नहीं चाहते थे कि वे इतनी जल्दी कोई निर्णय लें और जिम्मेदारी से विमुक्त हों, पर वो दृढ़निश्चयी थे इसलिए उनहोंने सारा व्यवसाय अपने बंधू बांधवों में बाँट दिया । पुत्रों ने उनकी सेवा के लिए उस वैभवशाली मकान में कई अनुचर रख दिए । समय बीतता गया उन्हें इस वैभव से भी विरक्ति होने लगी, वे साधू संतों के आश्रम जाते और वहाँ फैली आध्यामिकता को देखते तो उन्हें अपने निवास की वैभवता तुच्छ लगती ।
एक दिन एक आश्रम में उनकी भेंट एक साधू से हुई जो कई वर्षों बाद उस आश्रम में पधारे थे, उनहोंने अपनी इस विरक्ति का कारण उन साधू महाराज से पूछा । साधू बोले, " हर किसी मनुष्य के मन में यह विरक्ति नहीं होती, लोग मृत्यु शय्या तक भोग विलास चाहते हैं, यह संन्यास की और अगर्सर होने की अवस्था है, तुम्हारे पास जो कुछ भी है उसका त्याग करो, सब राग द्वेष का तिरिस्कार करो तो तुम्हें संन्यास प्राप्त हो जाएगा " । साधू महाराज की बातें सुनकर वे आश्वस्त हुए,पर वे सोचने लगे कि यह किस प्रकार संभव हो पायेगा, उनके पुत्र तो यह सब करने नहीं देंगे । इस पर वे काफी दिनों तक विचार करते रह, पर किसी ठोस निर्णय तक नहीं पहुँच सके । कई महीने बीत गए, आश्रम में कई साधू संत आते रहते थे उनसे स्वाध्याय होता रहता, नियम संयम, आध्यात्म पर गहन चर्चाये होती रहती । एक बार दर्शन पर एक संन्यासी जी प्रवचन दे रहे थे, वे मनुष्य के जीवन की अवस्थाओं का जिक्र कर रहे थे, कि यदि एक मानव की जीवन अवधि को सौ वर्ष का मान लिया जाय तो उसके प्रथम पच्चीस वर्ष ब्रह्मचर्य , तद्पश्चात गृहस्थ फिर वानप्रस्थ एवं अंत में संन्यास, ये चारों आश्रमों से व्यक्ति को पूरे नियम और धर्म से गुजरना चाहिए तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है । गोएनका जी के मन में कई प्रश्न अनुत्तरित थे , उनकी जिज्ञासा को देखते हुए संन्यासी जी ने उनसे कहा कि वे इस समय वानप्रस्थ आश्रम के अनुकूल हैं जहां समय बिता कर वे अंत में संन्यास धारण करें ।
जीवन में सभी निर्णय उनहोंने अकस्मात् ही लिए थे, इसलिए बिना किसी को बताये, अति आवश्यक वस्तुएं लेकर वे वानप्रस्थ आश्रम हेतु हरिद्वार से ऊपर की और प्रस्थान कर गए । देवप्रयाग में रात्रि विश्राम कर अगले दिन प्रात: वे निर्जन वन के भीतर प्रवेश कर गए , धीरे धीरे वे उन उतंग पर्वतों पर चढने लगे जो दूर से देखने पर भीमकाय लग रहे थे, चारों और सुगन्धित व् शीतल बयार बह रही थी , दूर नीचे बहती हुई नदी की बहुत धीमी आवाज़ आ रही थी , ऊंचे चीड़ के पेड़ों से गिरता पिरूल , बिखरे हुए ठीठे मानो उनका स्वागत कर रहे थे, चढते चढते वो काफी ऊपर आ गए , गोधूलि की वेला थी, एक सपाट स्थान पर वे रुक गए और चारों और का नज़ारा देखने लगे , चारों और नील वितान स्वच्छ आकाश सामने निर्भीक खड़ा हिमालय, उसके सहारे खड़े भूरे पर्वत, गहरी घाटियों में बिंदुओं जैसे दिख रहे ढलुवाँ छतों वाले मकान, उन से निकलता लकीर सा धुवाँ , बहुत नीचे सांप सी सरकती पहाड़ी सड़क , इस समतल मैदान पर मस्तक ऊँचा किये हुए देवदार के ऊंचे ऊंचे पेड़, उनसे टकराकर गुजरती हुई ठंडी हवा मानो उन्हें किसी दूसरी दुनिया में ले आयी थी । इस सपाट स्थान का उनहोंने और निरीक्षण किया तो देखा कि इस मैदान की पीठ पर एक खोह बनी हुई है, वे उसके नजदीक गए तो देखा कि इसके भीतर तो अच्छी खासी जगह है, उनहोंने उस खोह को साफ़ किया और अपना सामान उसमें रख दिया, ठीक है इसी स्थान को अपना ठिकाना बनाऊंगा, यह निश्चय कर वे इस समतल स्थान के चारों और घूमने लगे, तभी उनके आश्चर्य का पारावार न रहा जब उनहोंने कल कल कर बहता एक पतला सा झरना देखा , जो बहुत ऊपर से नीचे गिर रहा था, उसके वेग से एक छोटी सी झील बन गई थी , जिसका पानी स्वच्छ और निर्मल था । अवश्य ही यहाँ जंगली जानवर आते होंगे यह सोचकर वे प्रफुल्लित हुए , उनका मन एक अजीब सी आत्मीयता से भर गया । अपने साथ लाये कम्बलों को उस खोह के भीतर बिछा कर , लाये हुए फलों को खाने लगे , अब दिन ढलने लगा था, वे संध्या वंदन कर उस खोह के भीतर आराम करने लगे, जल्दी ही उन्हें नींद भी आ गई ।
प्रात: काल जल्दी ही वो जग गए , ऐसा अनुपम दृश्य उनहोंने कभी नहीं देखा था, सामने हिमालय पर्वत पर भुवन भास्कर की किरणें पड़ते ही पहले यह सोने के रंग में नहाया, फिर और अधिक प्रकाश पड़ने से यह चांदी के रंग में नहा गया, इसकी चोटियों से नीचे की और दरारों में ठिठके बादल इसकी दिव्यता को बढ़ा रहे थे । वातावरण में एक सुगंध सी व्याप्त थी दूए से ही उन्होंने पर्वतराज को प्रणाम किया और नित्य कर्म से निवृत्त होने उस छोटी सी झील की और चल पड़े । झील का पानी अत्यंत शीतल था पर आश्चर्जनक रूप से सम्मोहित करता लग रहा था , उन्होंने स्नान किया और स्वयं को व्यवस्थित करते हुए वे खोह के भीतर गए । वहां बहुत देर तक वे विचार करने लगे की इतना दिव्य स्थान तो उन्होंने कभी देखा ही न था , यह अवश्य ही उनके पूर्व जन्मों का फल है , खोह से बाहर निकल कर उन्होंने इस स्थान को और सुन्दर बनाने हेतु साफ़ सफाई प्रारम्भ कर दी, एक थोड़ी ऊंची शीला को साफ़ कर उन्होंने इसे अपने ध्यान हेतु निश्चित किया । कुछ दिनों बाद वे उस स्थान से नीचे उतरे और ग्रामीणों से भिक्षा मांग कर जो भी अन्न, फल इत्यादि मिलते उन्हें वहीं उदरस्त करने के स्थान पर संग्रह करते । यह उनका कर्म बन गया । भिक्षा में प्राप्त अन्न एवं फलों के अपशिष्टों को वे वहीँ छिड़क देते जिससे कुछ समय पश्चात उनके बीज अंकुरित होने लगे और शनै शनै छोटे फलदार वृक्षों से खड़े हो गए । कालान्तर में उन फलों और शाक भाजियों के कारण कुछ शाकाहारी जानवर वहां आने लगे और कुछ समय बाद तो कुछ खरगोश उनके साथ ही खोह में रहने लगे ।
जीवन अबाध रूप से व्यतीत हो रहा था उन्हें प्रसन्नता थी कि सदा की भाँति उन्होंने इस कार्य में भी सर्वश्रेष्ठ प्राप्त किया है , वे प्रात:काल उठते नित्यकर्म से निवृत होते , कुछ शाक इत्यादि उन खरगोशों को खिलाते , फिर उस शिला पर बैठ कर ध्यानमग्न हो जाते । उस एकाकी निर्जन स्थान में उस कल कल बहते झरने अथवा कुलांचे भरते हुए खरगोशों की पदचाप के अलावा और कुछ नहीं था , इससे उनकी एकाग्रता भंग नहीं होती , कई महीनों से वे हरदिन घंटों ध्यानमग्न रहते इस लिए उन्हें इसका अच्छा अभ्यास हो चला था, अब तो अकस्मात् आ रही किसी आवाज़ से भी उनका ध्यान नहीं बटता था । एक दिन वे ध्यानमग्न थे कि अचानक ही उन्हें कुछ विचित्र अनुभूति हुई, उनका ध्यान टूट गया, उन्होंने देखा की सुदूर पर्वत से एक नीली रौशनी शनै: शनै: उनकी और आ रही है और यह विरल होकर उनके माथे के रास्ते मष्तिस्क में प्रवेश कर गई है । वे हतप्रभ: रह गए , शिला से नीचे उतर कर उन्हें लगा कि वे बहुत हल्का महसूस कर रहे हैं । अवश्य ही उस पर्वत से उन्हें कोई संदेश दे रहा है, वे तत्काल ही उस पर्वत की और चल पड़े । कई घंटों की चढ़ाई के बाद सायंकाल वे अपने अनुमान से उस स्थान पर पहुंचे , वहां उन्होंने देखा कि यह स्थान तो और भी बड़ा है और काफी ऊंचा भी है , यहां से हिमालय और भी भव्य दिख रहा है , इस स्थान पर जो खोह है वह गुफा जितनी बड़ी है , चलो इसी स्थान को अपना साधना स्थल बनाया जाये यह सोचकर वे उस गुफा में प्रवेश कर गए और वहां रात्रि विश्राम किया । प्रात: काल जब वे उठे तो उन्होंने देखा कि सामने हिमालय कितना भव्य और विशाल दिख रहा है उनका मन अत्यंत प्रफुल्लित हो गया , वे तेजी से नीचे उतने लगे , मन में कई निश्चय करने लगे , कि वहां से क्या क्या लाना आवश्यक होगा , कम्बल तो लाने ही होंगे, अपने साथ रह रहे कुछ खरगोशों को भी लाना जरूरी होगा , उन निरीह प्राणियों को अब साथ रहने की आदत हो गई है , कई घंटों बाद वे नीचे उतरे , मन में अत्यधिक उत्साह था , वे सोच रहे थे कि गत रात्रि उनके बिना ये प्राणी भयभीत हो गए होंगे ।
वे मुदित भाव में आगे बढ़ रहे थे कि सहसा उन्हें लगा वहां छाई रहने वाली सुगंध के स्थान पर भयानक दुर्गन्ध व्याप्त है, जैसे जैसे वे उस स्थान के नजदीक आते गए उन्होंने देखा कि जगह जगह विष्टा फैली हुई है , सारी शाक भाजी और फल फूल बिखरे हुए हैं , जिस शिला पर बैठकर वे ध्यान करते थे वो एक तरफ लुड़की पडी है , उनका मन खिन्न हो गया और उन्हें अत्यंत क्रोध आया , वे झपटते हुए खोह के भीतर गए तो उन्होंने देखा कि एक अत्यंत घृणित और विष्टा में लिपट हुआ दैत्य सा लगाने वाला अत्यंत कुरूप प्राणी उन खरगोशों को जीवित ही चबाने का उपक्रम कर रहा है, वे क्रोध में भर कर उसे ललकारते हुए बोले," नीच, तेरी हिम्मत कैसे हुई , मेरे इस स्थान को उजाड़ने की ? दुष्ट , छोड़ दे उस खरगोश को " अपने पीले और दुर्गन्धयुक्त दाँतों को निपोरता हुआ वह बोला," खि : खि : खि : , अरे तुच्छ मनुष्य मैं कुछ दिन नहीं था तो तूने ये स्थान अपना बना लिया ? जा भाग जा नहीं तो तुझे भी इन खरगोशों की तरह खा जाऊंगा ! और पत्थर की मुद्गर लेकर वो उनकी तरफ झपटा , घबरा कर वे वहां से जान बचा कर नीचे की और भागे । काफी देर भागते हुए उनकी सोच सुन्न पद गई थी काफी देर बाद जब वे नीचे सड़क पर आये तो उन्होंने अपने को देवप्रयाग पर पाया । लोग उन्हें कौतूहल से देख रहे थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें । कुछ घंटे बीतने पर उन्होंने निश्चय किया की वे हरिद्वार ही चले जांयें । बस में बैठे हुए वह इस हादसे को सोच रहे थे, वे खिन्न थे और भीतर ही भीतर क्रोधित भी थे । धीरे धीरे लोग बस में बैठने लगे तो कंडक्टर सबसे टिकट खरीदने को कहने लगा , जब वो इनके पास आया तो ये बोले कि मेरे पास पैसे नहीं हैं , तो कंडक्टर बोला फिर बस में क्यों चढ़ गए हो, तभी पीछे से एक साधू महाराज की आवाज आई , अरे भाई, साधुओं से पैसा माँगते हो तुम्हें शर्म नहीं आती, फिर वो साधू उठकर उनकी बगल में आ कर बैठ गया । इन्होंने साधू का धयवाद प्रकट किया , तो साधू बोला बच्चा हम तो इन सब से पर हैं हमें कोई फर्क नहीं पडता, तुम बताओ कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो, वे सोचने लगे कि सह साधू तो बहुत वाचाल है, किन्तु इसने मेरी सहायता की है इसलिए इस पर खीजना ठीक नहीं होगा । वो पहले तो साधू की बात टालते रहे पर साधू बहुत अनुभवी था वह बोला बच्चा तुम्हारे मुख पर तेज व्याप्त है इसलिए मुझसे कोई भी प्रसंग मत छुपाओ । साधू के आत्मीय बचन सुनकर उनके आँखों से अश्रुधार बाह निकली, वे सिसकने लगे और उनका क्रोध भी थोड़ा पिघलने लगा, धीरे धीरे उन्होंने अपने बिठाये उन महीनों की सारी कथा उस साधू को बिलखते हुए सूना दी ।
पूरी बात सुन कर पहले तो साधू महाराज जडमत हो गए फिर बोले, बच्चा तू बहुत अधीर है, तू अभी संन्यास के योग्य नहीं है , संन्यास का मतलब है शनै: शनै: त्याग , मनुष्य को इस अवस्था में वो सभी प्रिय वस्तुएवं त्यागनी होती हैं जिससे वह अत्यंत प्रेम करता है, अंत में उसे प्राणों का त्याग करना पडता है, पर तू तो वहां संचय कर रहा था, तूने वहां फिर से एक गृहस्थी ही बसा ली, जिसका मोह तू हरिद्वार में ही छोड़ आया था , तुझमें सर्वश्रेष्ठ कार्य करने की अद्भुत क्षमता है , सृजन, विकास और संचय इन सं में तो तू सर्वश्रेष्ठ है पर वानप्रस्थ एवं सब्यास के मर्म को तू समझ न सका । वानप्रस्थ आश्रम वो अवस्था है जब मानव को गृहस्थ आश्रम में मिली सारी विलासिता का धीरे धीरे त्याग करना होता है, जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है " वन की और प्रस्थान अथवा केवल उतना ही सामन जितना वन में रहने के लिए आवश्यक हो , इसी प्रकार, मान, मोह, लोभ, क्रोध एवं अहंकार तथा ईर्ष्या और भय का त्याग कर देना चाहिए । तेरा वानप्रस्थ ही असफल हो गया, तू अपने सक्षमता रूपी अहंकार से उस पर्वत पर चढ गया वहां तूने अपने साथ लाई गई वस्तुओं का परित्याग करने के बजाए उनका अपने मोह के लिए उपयोग किया, सृजन के प्रति तू आसक्त था इसलिए तूने वहां वनस्पति एवं पशुओं का संरक्षण किया, तुझे इन सब से मोह था, और इन्हीं सब को देखते हुए तुझे अहंकार हुआ, फिर उस कुरूप प्राणी द्वारा तेरी सल्तनत तहस नहस किये जाने पर तुझे अत्यंत क्रोध आया, फिर उसके आक्रमण करने के भाव से ही तू अत्यंत भयभीत हो गया और खिन्न होकर यहाँ आंसू बहा रहा है, अरे सोच इतने दिन तूने वहां किया ही क्या?? अरे मूर्ख तुझे नहीं लगता कि तू जिसका ध्यान कर रहा था वो ही तुझे इस आश्रम का सच्चा रास्ता दिखा रहा था, उसके पैर पकड़ कर क्षमा मांगता तो वह तुझपर उपकार करता , अरे, निरीह प्राणी स्वयं भगवान ही तुझे दर्शन दे रहा था , तू समझ नहीं पाया क्योंकि तू अविवेकी है, बहुत सुन्दर अवसर खो आया रे पगले, बड़े बड़े ऋषि मुनि इस अवस्था तक नहीं पहुँच पाते , पूरा जीवन लगा देते हैं ।
साधू महाराज के वचन सुन कर इनके आँखों से अविरल अश्रुधार बहने लगी, मन की सारी अपवित्रता जैसे दूर होने लगी, अब संशय, राग, द्वेष आसक्ति सभी जैसे आंसुओं के रूप में बहते जा रहे हों , आत्मा जैसे बहुत हलकी हो गई हो , अब मन में केवल पश्चाताप ही बचा था जिसे अपना प्रारब्ध मान कर वो निश्चिन्त हो गए । देवप्रयाग से हरिद्वार बस कब पहुँच गई, उन्हें भान ही नहीं रहा , और वो साधू महाराज रास्ते में कहाँ उतर गए, उन्हें यह भी पता नहीं चला । बगल में बैठे हुए उस व्यक्ति से उन्होंने पूछा कि वो साधू महाराज कहाँ उतर गए तो वो व्यक्ति बड़ी अजीब नज़रों से उन्हें घूरता हुआ बोला, " महाराज, देवप्रयाग से ही में आपके बगल में बैठा हूँ आप लगातार रोये जा रहे हो, मैंने आपको टोकना उचित नहीं समझा, हो सकता है की आपका कोई सम्बन्धी मृत हो गया हो, ऐसे तो वही रोते हैं " उन्होंने फिर पूछा पर वो साधू महाराज कहाँ गए ? तो वो व्यक्ति उस सीट से उठकर दूसरी सीट पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा " कैसा पागल आदमी है , रास्ते भर तो रोता रहा, अब साधू, साधू की रट लगाए हुए है " हरिद्वार स्टेशन पर जब वो उतरने का उपक्रम कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनके सभी पुत्र और पुत्र वधुएँ उन्हें लेने के लिए आये हैं । अत्यंत विस्मय में पड़कर वे बड़े पुत्र से बोले तुम्हें कैसे पता चला कि मैं इस बस से आ रहा हूँ ? वो बोला," पिताजी आपके जाने के बाद हम सभी लोग अत्यंत चिंतित हो गए , आप बिना बताये ही चले गए , बहुत खोज बीन की पर कुछ भी पता नहीं चला, पर कल एक साधू महाराज आये थे उन्होंने बताया कि आप इस बस से आ रहे हैं , तभी हम सब आपको लेने आये हैं" उन्होंने फिर पूछा कि अब वो साधू महाराज कहाँ हैं ? तो लडके ने उत्तर दिया वो कह रहे थे कि वो रमता जोगी हैं और चलते पानी की तरह हैं इसलिए कहीं रुकते नहीं हैं । अब उन्हून लगा कि भगवान उन्हें फिर से साधू के रूप में मिले और उन्हें बताया कि वे अभी संन्यास हेतु उचित पात्र नहीं हैं, पर उनकी तपस्या तो रंग ला चुकी थी । उसके बाद उन्होंने हरिद्वार त्याग दिया और जीवन पर्यन्त निर्धनों की सेवा में जुट गए, अपने जीवन काल में उन्होंने कई विद्यालय, अस्पताल, धर्मशालोें बनवाईं और सद्कार्य करते हुए मोक्ष को प्राप्त हुए ।
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